Mahka Rajasthan Vimochan By CM Vasundhra Raje

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Rajasthan Chief Minister Vasundhra Raje Vimochan First Daily Edition of Dainik Mahka Rajasthan Chief Editor ABDUL SATTAR SILAWAT

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Dainik MAHKA RAJASTHAN

Thursday, July 28, 2016

मकराना की सड़कों पर ‘हीरो-आई स्मार्ट’

मकराना की सड़कों पर ‘हीरो-आई स्मार्ट’

अब्दुल सत्तार सिलावट, प्रधान सम्पादक
मकराना (नागौर)। मकराना की सड़कों पर हीरो मोटरसाइकिल का नया मॉडल दौड़ने लगा है। 1965 से 2010 तक जापान की होंडा के साथ मिलकर मोटरसाइकिल बनाने वाले हिरो-होंडा की अब पूर्ण रूप से भारतीय तकनीक से निर्मित हीरो-आई स्मार्ट का मुहुर्त किया गया। 
स्विफ्ट हीरो मोटर्स के विशाल शो-रूम में हर्ष ध्वनी के साथ हीरो-आई स्मार्ट के नये मॉडल को समारोह के अतिथि उप अधीक्षक पुलिस अमरजीत सिंह बेदी, मकराना थाना सी.आई. इन्द्रराज मरोड़िया, मार्बल व्यवसायी एवं समाजसेवी सेठ मोहम्मद रमजान रांदड, नगर परिषद सभापति शौकत अली गौड़, स्विफ्ट मोटर्स के डायरेक्टर दीपक बंसल, उत्कृष्ठ बंसल, प्रेम नारायण गर्ग ने अनावरण कर ग्राहकों को चाबी सौंपकर शुभारम्भ किया।
स्विफ्ट मोटर्स के डायरेक्टर दीपक बंसल ने बताया कि होंडा से अलग होने के बाद हीरो मोटर्स ने मोटर साइकिल के सभी पार्ट्स भारत में निर्मित करना शुरु कर दिया है जबकि नई तकनीक और अधिक माईलेज देने वाला इंजन राजस्थान में स्थित हीरो मोटर्स की फैक्ट्री में बनाया जा रहा है।

Wednesday, July 13, 2016

नेताओं की आँखों से पानी सूख गया हैः जल पुरूष


नेताओं की आँखों से पानी सूख गया हैः जल पुरूष

अब्दुल सत्तार सिलावट
जयपुर। दुनियाभर के देशों में विकास योजनाएं एजेंसियां और कम्पनियां बना रही है और भारत में भी ग्रामीण, मजदूर, गरीब और आदिवासियों के लिए विकास योजनाएं कम्पनियां और एजेंसियां ही बना रही है और इसके परिणाम में देश की जनता का विकास हो या नहीं हो योजना को बनाने वाली कम्पनियां खूब धन कमा रही है। यह कहना है जल पुरूष मेगसेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह का। आज की सरकारों के नेताओं का रिमोट अफसरशाही के हाथों में हैं और राजेन्द्र सिंह की बात की पुष्टी दिल्ली की रायसीना हिल्स के चारों ओर बैठे गगनचुम्बी, एयरकंडीशन सचिवालय की अफसरशाही ने कभी गांव की चौपाल नहीं देखी, खेत की मेड़ और गरीब की झौपड़ी में बैठे भूखे-प्यासे मासुमों की आँखों में शाम की रोटी का सपना नहीं देखा, लेकिन इनके विकास की योजनाएं वही अफसर बनाते हैं जिनका शरीर कभी बीच रास्ते में तेज बारिश में नहीं भीगा, कभी 48 डिग्री की गर्मी में पंचर मोटरसाइकिल को गांव के मिट्टी वाले रास्ते में से खींचकर दो तीन किलोमीटर दूर पंचर वाले की दुकान तक ले जाने का सौभाग्य नहीं मिला। इन अफसरों ने बर्फीली ठंडी हवाओं की रातों में रिक्शे वाले को दस पैबंद लगे कम्बल में किसी मकान या पेड़ की ओट में बिना नींद के आँखों में रात गुजारते हुए नहीं देखा है.... लेकिन मेरे देश के विकास की योजनाओं को बनाने वाले अफसरों की योजनाओं में सरकार द्वारा स्वीकृत हजारों करोड़ रूपये से गरीबों का भला हो या नहीं हो, किन्तु इन योजनाओं को लागू करवाने में लगी एजेंसियां, ठेकेदार, कम्पनियां और ब्यूरोके्रट्स आजादी के बाद के सत्तर साल से कमाकर मालामाल होते रहे हैं और अब तो लोकतंत्र के प्रहरी जिन्हें जनता चुनकर भेजती है वे भी इन अफसरों के सामने हाथ बांधे खड़े नजर आते हैं।
जल पुरूष राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि इक्कीसवीं शताब्दी में विश्व युद्ध होगा और यह जल युद्ध होगा। विश्व का तीसरा युद्ध जल युद्ध ही होगा। जल संरक्षण की मशाल जलाने वाले जल पुरूष राजेन्द्र सिंह जिन्हें रोमन मेगसेसे पुरस्कार विजेता की पहचान के साथ पूरी दुनिया में पानी की बात के लिए बुलाते हैं। गत वर्ष 2015 में स्टोकहोम वाटर पुरस्कार से भी राजेन्द्र सिंह को नवाजा गया। नाबार्ड बैंक के 35वां स्थापना दिवस पर जल संरक्षण पर नाबार्ड बैंक के मिशन की प्रशंसा करते हुए सिंह ने कहा कि बारिश को देखकर सरकारें खुश होती हैं, लेकिन बारिश के पानी को व्यर्थ बहने से रोकने, धरती में डालकर जल स्रोत बढ़ाने या नियमित उपयोग के लिए किसी योजना पर सरकारें ध्यान नहीं देती है।
राजेन्द्र सिंह ने कहा कि बारिश के पानी को दौड़ता है उसे चलना सीखा दो, उसके बाद रैंगना और अन्त में बहते पानी को धरती के गर्भ में डालकर सूरज की नजर से बचा लो तो बरसात का पानी हमें उज्जवल भविष्य की ओर ले जायेगा। भारत में कल तक महाराष्ट्र ऐसा राज्य था जहां विकास की गंगा बहती थी, लेकिन उसी महाराष्ट्र की आज किसानों की आत्महत्या वाले प्रदेश के रूप में पहचान रह गई है और इसका मुख्य कारण पानी के महत्व को नहीं समझा गया।
जल पुरूष राजेन्द्र सिंह ने कहा कि पहले राजाओं का शासन बदलने से और आज देश की सरकारें बदलने से हिस्ट्री बदल जाती है, लेकिन भूगोल को बदलने में पीढ़ियों की कुर्बानी लग जाती है। ऐसा ही भूगोल पानी के संरक्षण, नदियों और तालाबों में बढ़ते मिट्टी के भराव से बरसात का पानी नदियों, तालाबों का रास्ता छोड़ आबादी और फसलों वाली उपजाऊ भूमि को बर्बाद करता हुआ गंदगी वाले नालों के साथ बह जाता है लेकिन उसे कल के भविष्य को उज्जवल रखने के लिए कोई भी बड़ी योजना या समाज का वर्ग आगे आकर जल बचाने का मिशन नहीं चला रहा है। सिंह ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि दुनिया की निगाहों में पानी सूख गया है और नेताओं की आँखों में भी अब तो पानी सूख गया है।

नाबार्ड मिशन, जल ही जीवनः अरोरा

नाबार्ड के 35वें स्थापना दिवस पर ग्रामीण विकास और जल संरक्षण में बैंक की भागीदारी पर प्रकाश डालते हुए नाबार्ड बैंक की मुख्य महाप्रबंधक सरिता अरोरा ने बताया कि ‘जल ही जीवन है’ के नारे को सम्बल देने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में नाबार्ड बैंक के सहयोग से वाटर शैड विकास परियोजनाओं को निरन्तर जारी रखा जायेगा तथा पूर्व में जिन क्षेत्रों में वाटर शैड लागू किये गये हैं उन्हें ऋण सुविधा बढ़ाकर प्रोत्साहित किया जायेगा।
श्रीमती सरिता अरोरा ने नाबार्ड द्वारा आयोजित ‘जल जागरूकता और जल संरक्षण’ विषय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि देश में जोहड़ जल संचयन पद्धति से हमारे पूर्वज देसी तकनीक से जल के स्रोतों को पुनर्जीवित करते थे और आज भी जोहड़ तकनीक कामयाब है। आपने कहा कि जल और मृदा संरक्षण की तकनीक से आमजन को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने के प्रयास सफल हो रहे हैं।
मुख्य प्रबंधक अरोरा ने 1982 में स्थापित नाबार्ड बैंक के 34 साल के सफर में कृषि और ग्रामीण विकास की उपलब्धियों में सहयोगी गैर सरकारी संस्थाओं, तकनीकी विशेषज्ञों, सरकार के विभागों और आमजन के सहयोग को नाबार्ड मिशन की सफलता का श्रेय देते हुए आभार व्यक्त किया।

Monday, July 11, 2016

बैंकों वाले प्रधानमंत्री के विरोध में


प्रधानमंत्री रोजगार योजना

बैंकों वाले प्रधानमंत्री के विरोध में

अब्दुल सत्तार सिलावट
गुजरात के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री पद तक नरेन्द्र मोदी को पहुंचाने वाले देश के करोड़ों युवा एवं बेरोजगारों के लिए बनी ‘प्रधानमंत्री रोजगार योजना’ को बैंकों के अधिकारी ‘फेल’ करने में लगे हैं। वैसे तो गरीबों को छोटे रोजगार के लिए ऋण, ग्रामीणों को पशु-डेयरी ऋण तथा किसानों को ट्रेक्टर खरीदने के लिए सरकारी योजनाओं में बैंक अधिकारियों को ऋण डूबता हुआ ही नजर आता है तथा जिला उद्योग केन्द्र, सहकारी समितियां, अल्पसंख्यक विभाग द्वारा जिन बेरोजगारों या जरुरतमंदों को ट्रेनिंग देकर, कई बार इनके इंटरव्यू लेकर, सरकारी अधिकारियों द्वारा ‘ठोक-बजाकर’ बैंकों को ऋण के लिए आवेदन भेजे जाते हैं, लेकिन बैंक अधिकारी बेरोजगारों की ऋण सिफारिश की राशि को 20 से 30 प्रतिशत कर देते हैं या सरकारी कर्मचारी गारन्टर मांग कर भगा देते हैं। ऐसे बेरोजगार छोटे काम धंधा करने वाले लोग अपनी योजना शुरु नहीं कर पाते हैं तथा बैंकों से मिला एक चौथाई ऋण भी फंस कर ‘डिफाल्टर’ बन जाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दो साल के शासन में सबसे अधिक ध्यान देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं को ‘इज्ज़त की रोटी’ देने के लिए ‘प्रधानमंत्री रोजगार योजना’ में 35 प्रतिशत तक अनुदार देकर सेवा रोजगार पर ऋण सीमा दस लाख तथा उत्पादन ईकाई पर 35 लाख तक के ऋण बिना गारन्टर के देने की योजना को देश व्यापी लागू किया है। ऐसी ही एक योजना राजस्थान सरकार ने ‘भामाशाह’ के नाम से जिसमें सेवा रोजगार पर 5 लाख तथा उत्पादन ईकाई को दस लाख तक के ऋण पर ब्याज में 4 प्रतिशत के अनुदान का प्रोत्साहन दिया गया है।
बेरोजगार युवाओं के लिए जिला स्तर पर ‘डिस्ट्रीक्ट लेवल कमेटी’ बनाकर इस कमेटी में एक अधिकारी लीड बैंक, सभी बड़ी बैंकों के रिजनल मैनेजर, जिला उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक एवं तकनीकी अधिकारी एक साथ बैठकर आवेदनकर्ता का इंटरव्यू, उसके व्यवसाय के प्रति अनुभव एवं व्यापार कर पायेगा या नहीं यह क्षमता जांचकर बैंक को ऋण के लिए सिफारिश करते हैं, लेकिन इतने बड़े अधिकारियों के समूह द्वारा ऋण के लिए की गई सिफारिश को बैंक के एक छोटे से केबिन में बैठा बैंक का ऋण अधिकारी उस बेरोजगार युवा को ‘चोर’ की नजर से देखना शुरु कर देता है। सबसे पहले अभी ‘क्लोजिंग’ है, अभी हाफ ईयर क्लोजिंग है, अभी कोटा पूरा हो गया या फिर एक सरकारी कर्मचारी की गारन्टी लेकर आ जाना, इन सबके बाद भी यदि युवा बेरोजगार बैंक का पीछा नहीं छोड़ता है तो उसे सरकारी अधिकारियों की कमेटी द्वारा स्वीकृत दस लाख की फाइल को कांट-छांट कर दो लाख का ऋण स्वीकृत कर देते हैं। अब जिस बेरोजगार ने दस लाख की योजना बनाई थी वह दो लाख में तो व्यापार नहीं कर सकता, तब यह दो लाख भी व्यापार शुरु करने के चक्कर में ‘इधर-उधर’ फंसकर बैंक का ‘डिफाल्टर’ हो जाता है और बैंक के कौने वाले केबिन में बैठे अधिकारी की बेरोजगार के प्रति फाइल हाथ में आते ही की गई ‘भविष्यवाणी’ सही साबित हो जाती है।
अब बैंक अधिकारियों का दूसरा ‘फण्डा’ भी समझ लिया जाये। किसी योजना के लिए 100 फाइलें पैंडिंग है और इनकी कुल राशि पांच करोड़ बनती है तथा सरकारी बजट से एक करोड़ की राशि मिली है तब इन सौ फाइलों में ‘समान’ राशि वितरण कर सभी पैंडिंग फाइलों को ‘क्लीयर’ कर देते हैं। अब सात लाख के आवेदन को भी एक लाख तथा दस लाख के आवेदन को भी एक लाख का ऋण देकर बैंक वाले शत-प्रतिशत ऋण का लक्ष्य तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन वह बेरोजगार इज्ज़त की रोटी कमाने के लिए अपनी योजना अनुसार व्यापार तो नहीं कर पाता है बल्कि बैंक की लिस्ट में ‘डिफाल्टर’ जरूर हो जाता है।
सुझावः बदलाव और योजना की सफलता के लिए प्रधानमंत्री रोजगार योजना के लिए भारत सरकार जो करोड़ों रूपये की राशि बैंकों को सुपुर्द करती है वह राशि बेरोजगारों को ऋण स्वीकृत करने वाली कमेटी या जिला कलेक्टर के मार्फत बिना बैंकों को फाइल भेते स्वयं कमेटी द्वारा चैक जारी कर ऋण दिया जाना चाहिये। जिससे बेरोजगारों के लिए प्रधानमंत्री की योजना सफल हो, बेरोजगार युवाओं को सीधा लाभ मिले तथा प्रधानमंत्री की बेरोजगारों को आर्थिक मदद की योजना को ‘असफल’ करने के मिशन में लगे बैंक अधिकारियों से बेरोजगारों को मुक्ति मिले।


‘अर्जुन’, अब तो तीर चला दो

राजस्थान के बीकानेर सांसद अर्जुनराम मेघवाल हाल ही में केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में वित्त राज्य मंत्री बनाये गये हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बेरोजगारों को रोजगार देने की योजना को क्रियान्वित करने वाले उद्योग विभाग में तीस साल तक नौकरी कर भारतीय प्रशासनिक सेवा और अब संसद के गलियारों में बैंकों की कमाण्ड वाले मंत्रालय के मंत्री भी हैं।
केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल प्रधानमंत्री रोजगार योजना में बैंकों के अधिकारियों द्वारा बेरोजगारों को ऋण की सिफारिश उद्योग विभाग द्वारा करने के बाद कैसे चक्कर लगवाते हैं। उन्हें चोर समझकर सरकारी विभाग की सिफारिश की गई राशि का कुछ हिस्सा देकर जानबूझकर उसे ‘चोर’ बनने पर मजबूर कर देते हैं।
केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपने युवाओं को रोजगार, ईज्ज़त की जिन्दगी को साकार करने के लिए ‘पहला तीर’ बैंकों के मार्फत ऋण वितरण की नीति को बदलकर सीधे कलेक्टर, जिला उद्योग केन्द्र के मार्फत ऋण दिया जाना चाहिये।
सरकार की हजारों करोड़ की योजनाएं पेयजल, सड़कें, ग्रामीण विकास मनरेगा जैसी योजनाएं यदि गांव का सरपंच, पटवारी, तहसीलदार और एसडीएम बिना भ्रष्टाचार के चला सकते हैं जो प्रधानमंत्री रोजगार योजना के युवाओं को जिला कलेक्टर और जिला उद्योग केन्द्र के अधिकारी बहुत अच्छी तरह से बिना भ्रष्टाचार के सफल बना सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)